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ऋषिकेश-देहरादून रुट पर उत्तराखंड की पहली महिला बस परिचालक

Posted By akash sharma / May 18, 2017 / , , / 0 Comments

पहाड़ी रुट पर उत्तराखंड परिवहन की खस्ताहाल बस से थकाने वाला सफर करने के बाद जब मैं ऋषिकेश बस स्टेशन पर उतरी तो वहां कई बस कंडक्टर जोर-जोर से अलग अलग जगहों का नाम लेकर आवाज लगा रहे थे। मसलन, दिल्ली – दिल्ली, मेरठ- मेरठ, अंबाला-अंबाला, सहारनपुर-सहारनपुर आदि। इन सब आवाजों के बीच मेरे कानों को देहरादून-देहरादून पुकार रही एक आवाज सुनाई दी, जिसने मेरा ध्यान फौरन अपनी तरफ खींच दिया। मुझे ऋषिकेश से देहरादून ही जाना था, लेकिन उस आवाज पर आकर्षित होने की वजह यह नहीं थी। वजह यह थी वो आवाज किसी पुरुष कंटक्टर की नहीं बल्कि एक महिला की थी।

महिला द्वारा देहरादून-देहरादून पुकारे जाने पर पहले तो मुझे थोड़ा अटपटा सा लगा, फिर मैंने सोचा कि संभवत: महिला को जल्दी जाना होगा तो वह अपनी तरफ से पहल कर सवारियों को आवाज दे रही होगी। बहरहाल यह सोचते हुए मैं भी उसी बस में बैठ गई। वह महिला अभी भी आवाज दिए जा रही थी। कुछ देर बाद बस देहरादून के लिए चलनी शुरू हुई तो वह महिला भी भीतर आ गई, और कंडक्टर सीट पर बैठे एक व्यक्ति से कहा, ‘आप पीछे बैठ जाइए, ये सीट मेरी है।’

पसीने से तर – बतर यह महिला दिखने में वर्किंग वूमन लग रही थी। गाड़ी कुछ मीटर दूर ही चली थी कि इस बीच मुझे ध्यान आया कि कुछ दिन पहले ही परिवहन विभाग ने मैदानी रुट पर महिला परिचालकों की तैनाती की है। ओह, तो इस बस में भी महिला परिचालक है, यही सोच कर मुझे न जाने क्यों इतनी खुशी हो रही थी कि मैं इतनी थकान के बाद भी मुस्काराए जा रही थी।

पहली बार उत्तराखंड परिवहन की बस में ट्रैवल करने में अच्छा लग रहा था। क्योंकि आज बस में कंडक्टर किसी महिला या बुजुर्ग को डांट नहीं रहा था कि, जल्दी बैठो। बल्कि ये कंडक्टर बुजर्गों का सामान खुद ही उठा कर रख रही थी। जब तक कोई भी ठीक से उतरता नहीं, तब तक बस को आगे नहीं बढ़ाती। सबका स्वागत मुस्कान के साथ कर रही थी।

मुझे इस महिला को देखकर जितनी खुशी मिल रही थी, उतनी ही ऊर्जा भी। इस परिचालक के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ रही थी। खुशकिस्मती थी कि मैं कंडक्टर वाली सीट के पीछे ही बैठी थी। फिर जब बात शुरू हुई तो पता चला कि ये सिर्फ महिला परिचालक ही नहीं बल्कि उत्तराखंड की पहली महिला परिचालक है। चंद्रकांता।

परिवार नहीं था साथ

देहरादून की रहने वाली चंद्रकांता ने बताया कि उनके पति जिनका कि निधन हो चुका है, उत्तराखंड परिवहन विभाग के वर्कशॉप में काम करते थे। पति के निधन के बाद दो बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह उनके कंधों पर पर आ गई थी। चंद्रकांता ने परिवहन विभाग के उच्च अधिकारियों से अपने लिए किसी तरह के रोजगार की गुहार लगाई तो अधिकारियों ने ऑफिस में कोई पद खाली न होने का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें सिर्फ परिचालक के पद पर ही तैनात किया जा सकता है। चंद्रकांता ने बताया कि पहले तो वे घबराई लेकिन अपने बच्चों की परवरिश के लिए उन्होंने यह चुनौती स्वीकार कर ली। लेकिन चंद्रकांता के लिए इससे भी बड़ी चुनौती था अपने परिवार को मनाना। दरअसल चंद्रकांता के परिजन उनके बस कंडक्टर बनने के फैसले के पक्ष में नहीं थे। परिजनों को लगता था कि यह काम महिलाओँ के बस का नहीं है। उन्होंने चंद्रकांता को कंडक्टरी करने से साफ मना कर दिया। लेकिन चंद्रकांता तो मानो ठान कर बैठी थीं। उन्होंने परिवार वालों के विरोध के आगे हार नहीं मानी और अपना सफर शुरू कर दिया।

आसान नहीं था सफर

चंद्रकांता आज बड़ी कुशलतापूर्वक अपनी जिम्मेदारी को निभा रही हैं, लेकिन वे बताती हैं कि उनके लिए इस मुकाम तक पहुंचना इतना आसान नहीं था। चंद्रकांता बताती है कि जब उन्होंने अपनी नौकरी शुरू की तो शुरुआत में कोई भी ड्राइवर उन्हें साथ ले जाने के लिए तैयार ही नहीं हुआ। कुछ दिन बाद जब ड्राइवर मान गए तो उनके सामने नई मुसीबत यह आई कि सवारियों को कैसे समझाया जाए कि वे ही बस की कंडक्टर हैं। चंद्रकांता बताती हैं कि शुरुआत में लोग कई बार पैसे ही नहीं देते थे, कहते थे कि कंडक्टर को आने दो। वह बताती है कि उनका आधा समय तो लोगों को ये समझाने में लग जाता था कि वहीं बस की परिचालक हैं। उसके साथ ही शराबी यात्रियों से निपटने जैसी कई व्याव्हारिक दिक्कतों से भी उन्हें शुरुआती दिनों में काफी जूझना पड़ा। चंद्रकांता बताती हैं कि वह कई बार रात – रात भर रोती और सुबह फिर नई चुनौती के लिए तैयार हो जाती। लेकिन धीरे – धीरे अपने व्यवहार और हिम्मत से चंद्रकांता ने विभाग में अपनी जगह बनाई । अब ड्राइवर भी सपोर्ट करने लगे और चंद्रकांता को यह काम अच्छा लगने लगा। और आज चार साल बाद चंद्रकला ऋषिकेश, कोटद्वार, पोंटा साहिब आदि कई रुटों पर जाती हैं।

कई महिलाओं के लिए बनी प्रेरणास्रोत

चंद्रकांता ने इस नौकरी से न सिर्फ अपने परिवार को संभाला है बल्कि कई महिलाओं की प्रेरणास्रोत भी बनी हैं। चंद्रकांता को देखने के बाद महिलाएं सिर्फ मजबूरी में ही नहीं बल्कि अब शौक के लिए भी परिचालक बनना चाहती हैं। चंद्रकांता बताती हैं कि कई लड़कियां उन्हें अपनी फोन नम्बर दे कर कहती हैं कि, जब परिचालक की वैकेंसी आएगी तो हमें भी फोन करके बता देना। साथ ही कई महिलाएं जो अपने पति या पिता की जगह नौकरी लगी हैं, उन्होंने भी इस पेशे को अपनाया है। उत्तराखंड में 2013 से महिला परिचालक के तैनाती हुई थी। इन पांच सालों में 40 महिलाएं आज उत्तराखंड के अलग – अलग रुटों पर परिचालक का काम कर रही हैं। चंद्रकांता को उत्तराखंड सरकार ने महिला दिवस पर तीलू रौतेली पुरस्कार से नवाजा है। यात्री भी रहते हैं खुश अपने अनुभवों से मैंने भी ये जाना है कि महिला परिचालक होने से यात्री ज्यादा सुरक्षित और कंफर्ट महसूस करते हैं। खासकर महिलाएं। चंद्रकांता बताती हैं कि वह ड्राइवर और सवारियों को कभी भी बस में धूम्रपान नहीं करने देती हैं, चाहे इसके लिए उन्हें शख्त ही क्यों न होना पड़े। इसे महिला परिचालक होने का लाभ ही कहेंगे कि ड्राइवर नशा भी नही करते और वाहन को नियंत्रित रफ्तार से चलाते हैं। इससे यात्री भी खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। चंद्रकांता से बात करते-करते कब ऋषिकेश से देहरादून तक का सफर बीत गया पता ही नहीं चला। इतनी सारी कठिनाईयों और चुनौतियों के बाद भी चंद्रकांता के चेहरे पर मुस्कान थी। घंटेभर के सफर में उनकी जिंदादिली ने मेरा ही नहीं बल्कि सभी यात्रियों का दिल जीत लिया। जिस चलती बस में मैं चंद्रकांता की एक अच्छी तस्वीर नहीं ले सकी, उसी बस में चंद्रकांता सवारियों को चढती-उतारती हैं। टिकट काटती हैं, और कई बार सीट न होने पर खड़े – खड़े सफर करती हैं। जिस काम को कभी सिर्फ पुरुषों का अधिकार समझा जाता था, चंद्रकांता जैसी महिलाओं ने उस धारणा को तोड़कर न केवल एक नया आयाम स्थापित किया है, बल्कि एक बार फिर यह साबित किया है कि महिलाएं पुरुषों से कमत्तर नहीं है।

Input From : Dainik Uttarakhand

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